Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 34–37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verses 34–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 34-37
संस्कृत श्लोक
मनःस्पन्दनमात्रेण चित्रं चित्तं यदुत्थितम् ।
सृष्टिर्वा भोगिनी स्फारा व्यवहारविकारिणी ॥ ३४ ॥
रुद्रोपेन्द्रमहेन्द्राद्या शैलसागरसंकुला ।
पातालरोदोदिक्स्वर्गमार्गसंकटकोटरा ॥ ३५ ॥
संकल्पजालमत्यन्तं मयेदमभितस्ततम् ।
अधुनाविरतोऽस्म्यस्माद्विकल्पोल्लासनक्रमात् ॥ ३६ ॥
इति निश्चित्य विरतः कल्पनानर्थसंकटात् ।
अनादिमत्परं ब्रह्म स्मरत्यात्मानमात्मना ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सृष्टि के विस्तार का वर्णन करके सृष्टि की निवृत्ति और शास्त्र के निर्माण में कारण
कहने के लिए भूमिका बोधिते हैं ।
अपने-अपने उत्कर्षं के लिए मनुष्यआदि प्रजाओं में धर्म ओर अधर्म की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न
कर रहे इन्द्र विरोचन आदि देवता ओर असुरों के अधिपतियों द्वारा जवर्दस्ती सात्विकि, राजस और
तामस वृत्तियों में लोगों को लगाने से वध, बन्धन, जन्म-जरा आदि हजारों क्लेशो से अतिपीड़ित
जगत की सृष्टियों से विरक्त प्रजासमूहों को उत्पन्न करनेवाले ये पूर्वोक्त प्रभु कमलासन पर बैठे हुए
ब्रह्मा निम्नलिखित विचार करते हैं ॥ ३ ३॥ मन के संकल्पमात्र से व्यष्टिजीवोपाधिभूत जो विचित्र चित्त
उत्पन्न हुआ और जो उसके उपभोग के लिए व्यवहाररूप विकार से युक्त विशाल भुवन आदि की
सृष्टि, जो रुद्र, विष्णु और महेन्द्र से युक्त है, पर्वतों से और सागरों से व्याप्त है, जिसका मध्यभाग,
पाताल, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, दिशा, और स्वर्ग मार्ग से आकीर्णं है, यह सब मैंने अपना संकल्पसमूह ही
चारों ओर विस्तृत किया है । इस समय इस विकल्प के उल्लासन क्रम से मैं विरक्त हो गया हूँ, ऐसा
विचार कर कल्पनारूपी अनर्थकारी संकट से विरत हो ब्रह्मा अनादि, आत्मरूपी परब्रह्म का अपने से
स्मरण करते हें