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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

नार्जवं नास्य संत्यागो वपुषो नच संग्रहः । नाना न चेतनं नेह न स्थितिर्नास्थितिः स्थिता ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब तो समाधिकाल में उनकी सरलता, सृष्टि, संहार आदि के समय उस सरलता का त्याग, देह आदि का ग्रहण, सृष्टि के रूप से अनेक होना, व्युत्थानकाल में चेतन होना, पद्म में स्थिति, अन्यत्र स्थिति यों विविध प्रकार के भावारम्भों से युक्त चित्त- वृत्तियों में अज्ञानी के तुल्य ही विषमता हुई । ऐसी आशंका कर क्रमशः उक्त शंकाओं का परिहार करते हैं। ब्रह्मा को समाधिकाल में न ऋजुता होती है, न सृष्टि और संहारकाल में उसका त्याग होता है, न देहादि का ग्रहण होता है, न सृष्टिरूप से अनेकता होती है, न व्युत्थान के समय चेतनता होती है और न कमलपर स्थिति तथा अन्यत्र अस्थिति होती है