Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 6, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 6, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इति संचिन्त्य शुक्रेण मनसैव शचीपतिः ।
तेनाभिवादितस्तत्र द्वितीय इव खे भृगुः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यह सोचकर उन शुक्राचार्य ने मन से ही शचीपति इन्द्र को आकाश में
स्थित दूसरे महर्षि भृगु के तुल्य अभिवादन किया