Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 60, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 60, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
तन्मात्रवति तावद्भिरशून्येऽम्बरकोटरे ।
उदेति यावद्भगवानिन्दुरुद्दाममण्डलः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रकलास्वरूपता को प्राप्त हुए वे भी जीवसमूह कल्पवृक्ष के फलों में रसरूप से प्रवेश द्वारा
उपभोक्ता के वीर्यरूप से परिणत होकर देवगर्भ से उत्पन्न होते हैं, ऐसा क्रम बतलाते हैं।
पूर्ण भगवान चन्द्रमा जितनी किरणों से संसार को प्रकाशित करते हुए उदित होते हैं, चंचल, श्वेत
वर्ण की उतनी किरणों से पूर्ण इसलिए क्षीरसागर के स्थानापन्नरूप पूर्वोक्त तन्मात्रास्वरूप लिंगदेहवाले
आकाश में वह जीवपरम्परा स्थित होती है