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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 62, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 62, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । धीरो विचारवान्साक्षादादावेव महाधिया । शास्त्रेण विदुषा शास्त्रं सुजनेन विचारयेत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

मूढो के चिन्तन योग्य विषयों के परित्याग से बार-बार सत्‌ शास्त्र का विचार करना चाहिए, ऐसा जो पहले कहा, उस पर कैसे उसका विचार करना चाहिए, ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं। बाह्य ओर आभ्यन्तर ब्नन्द्रों को सहनेवाला, ऊहापोह में कुशल पुरुष स्वयं ही (तदब्रिज्ञानार्थ स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः“ इत्यादि शास्त्र के अनुसार प्राप्त हुए, तत्त्वज्ञानी ओर शिष्य के अपराध को सहनेवाले महामतिगुरु के साथ शास्त्र का पहले विचार करे

सर्ग सन्दर्भ

इकसठवाँ सर्ग समाप्त बासठवाँ सर्ग श्रीरामचन्द्रजी में शास्त्रोक्त सब गुणों -सी समृद्धि का कथन और अधम पुरुष की भी सत्संग और पौरुष से उत्तम स्थिति का प्रतिपादन ।