Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 7, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चन्द्रपादपरामृष्टा यथा निशि कुमुद्वती ।
संस्पर्शामृतपानेन तव जीवामि सुन्दर ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
सुन्दर, जैसे चपलचकोरी चन्द्रमा की किरणों के रसपान से जीवित रहती है वैसे ही मैं आपके स्पर्शरूपी
अमृतपान से जीवित हो रही हूँ