Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 7, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 7, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
आलिङ्ग्यामृतसंपूर्णे स्वपद्महृदये कुरु ।
इत्युक्त्वा पुष्पमृद्वङ्गी सा तस्य पतितोरसि ।
व्याघूर्णितालिनयना सुतरोरिव मञ्जरी ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह कहकर कल्पवृक्ष की मंजरी के तुल्य जिसके नयनरूपी भवर मद से घूम रहे थे,
तथा फूलों के तुल्य कोमल अंगवाली शुक्र के वक्षस्थल पर गिर गई