Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 9, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 9, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यमनियमकृशीकृताङ्गयष्टिश्चरति तपः स्म भृगूद्वहस्य चेतः ।
तनुरथ पवनापनीतरक्ता चिरमलुठन्महतीषु सा शिलासु ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
शुक्राचार्य का चित्त, जिसने कि यम और नियमों से अपनी शरीरयष्टि को कृश बना डाला था,
तपस्या करता था और उनका वह पूर्वशरीर, जिसके रुधिर को वायु ने सुखा दिया था, बड़ी-बड़ी
शिलाओं पर चिर काल तक बराबर लुढ़कता रहा