Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 9, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 9, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमभितश्चक्रार्पितमिवाकुलम् ।
मनस्तस्य विशश्राम समङ्गासरितस्तटे ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके मन को, जिसने विविध भोगों की कल्पनाओं से भ्रमण किया, जन्म-मरण परम्पराओं
की कल्पना से चक्र में रक्खे हुए की तरह व्याकुलतापूर्वक चारों ओर ऊपर नीचे चक्कर काटा, समंगा
नदी के तट पर विश्रान्ति मिली