Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 10, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 10, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 10 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति चिन्तयतस्तस्य पुरः संप्रविवेश ह ।
प्रतीहारः परो भानोः स्यन्दनाग्र इवारुणः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त प्रकार से विचार कर रहे राजा जनक के सामने
जैसे सूर्य के रथ के आगे अरुण प्रवेश करते हैं वैसे ही प्रधान द्वारपाल ने प्रवेश किया
सर्ग सन्दर्भ
नवाँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग मध्याह्न काल के कृत्यों में प्रवृत्त होने के लिए द्वारपाल द्वारा प्रार्थना करने पर भी राजा जनक का मौन होकर विचार करना |