Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 9, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
अयमहमिदमाततं ममेति स्फुरितमपास्य बलादसत्यमन्तः ।
रिपुमतिबलिनं मनो निहत्य प्रशममुपैमि नमोऽस्तु ते विवेक ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए मैं कभी भी परमात्मनिष्ठा का त्याग नहीं करूँगा, यह कहते हैं।
मैं आत्मरूपी मणि को पाकर एकान्त में उसी को देख रहा हूँ, मेरी अन्य वस्तु की इच्छा अत्यन्त शान्त
हो गई है अत: मैं शरद् ऋतु में हिमालय आदि पर्वतों पर बादल की भाँति सुखपूर्वक स्थित होता हूँ॥ ६ ४॥
अब पूर्वोक्त विषय का ही संक्षेप से उपसंहार करते हुए विवेकरूपी गुरु को नमस्कार करते हैं।
यह देह मैं हूँ, यह धन, राज्यादि मेरा है, इस तरह स्फुरित हुए विस्तृत असत्यरूप का ज्ञानबल से
नाश कर अत्यन्त बलवान अन्दर स्थित मनरूपी शत्रु को समाधि के अभ्यास से अच्छी तरह मारकर
सप्तम भूमिका में विश्रान्तिरूप प्रशम को मैं प्राप्त हो रहा हूँ । हे विवेक, आपको नमस्कार है