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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 9, Verses 60–64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 9, verses 60–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 60-63

संस्कृत श्लोक

प्रबुद्धोऽस्मि प्रहृष्टोऽस्मि दृष्टश्चोरोऽयमात्मनः । मनो नाम निहन्म्येनं मनसास्मि चिरं हतः ॥ ६० ॥ एतावन्तमिमं कालं मनोमुक्ताफलं मम । अविद्धमासीदधुना विद्धं तु गुणमर्हति ॥ ६१ ॥ मनस्तुषारकणिका विवेकार्कातपेन मे । चिरप्रवृत्तये नूनमचिराल्लयमेष्यति ॥ ६२ ॥ विविधैः साधुभिः सिद्धैरहं साधु प्रबोधितः । आत्मानमनुगच्छामि परमानन्दसाधनम् ॥ ६३ ॥ आत्मानं मणिमेकान्ते लब्ध्वैवालोकयन्सुखम् । तिष्ठाम्यस्तमितान्येहः शारदीवाचलेऽम्बुदः ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसे मारता हूँ। यह केवल चोर ही नहीं है, किन्तु वैरी भी है, क्योंकि इसने मुझे बहुत दिन तक मारा है। इतने दिन तक मेरा मनरूपी मोती विद्ध यानी लक्षित नहीं था। अब वह लक्षित होकर शम, दम आदिरूप सूत्र के योग्य हो रहा है। जैसे तुषारकणिका सूर्य के ताप से वायु में स्थिति प्राप्त करने के लिए लय को प्राप्त होती है वैसे ही मेरा मन विवेक से ब्रह्मतत्त्व में स्थिति प्राप्त करने के लिए बहुत शीघ्र लय को प्राप्त होगा। स्थिर महात्माओं ने मुझे विविध उपदेशों द्वारा अच्छी तरह बोध करा दिया है। अब में परमानन्दरूप आत्मा का अनुगमन कर रहा हूँ