Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
किंचिदामृष्टरूपं यद्ब्रह्म तच्च स्थिरं मनः ।
कल्पना सत्सदैवैतत्सदिवोपस्थिता हृदि ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
काल द्वारा मनन से यह कलना मन होती है, ऐसा कहते हैं।
जो सच्चिदानन्दरूप है, वही कलना बन कर सदा हृदय में सत् के समान स्थित संकल्प-विकल्प
कल्पना होकर यह प्रसिद्ध मन बन जाता हे