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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

चित्तमित्येव रूढेयं यदैव कलनोदिता । तदैव चित्त्वं विस्मृत्य सा जडेव व्यवस्थिता ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्य अनुभवस्वभाव ब्रह्म का स्वरूपविस्मरण होने पर कलना ही स्मृतिता को और चित्तता को प्राप्त होती है, ऐसा कहते है । चित्तरूप से प्रसिद्ध यह कलना जभी उदित होती है, तभी वह चित्तव को भूलकर जड के समान स्थित हो जाती हे