Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
यथा शिलामयी कन्या चोदितापि न नृत्यति ।
तथेयं कलना देहे न किंचिदवबुध्यते ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो नैयायिक आदि नित्य साक्षी को न जानते हुए पर प्रकाश्य अनित्य ज्ञान को ही अर्थप्रकाशक
मानते हैं, उनका बहुत उदाहरणों से उपहास करते है।
जैसे पाषाणमयी कन्या को नाचने के लिए कितना भी कहा जाय, पर वह नाचती नहीं वैसे ही यह
कलना शरीर में कुछ भी नहीं जानती