Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 67–68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 13, verses 67–68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 67,68
संस्कृत श्लोक
असृगालिप्तगात्रैश्च शवैः क्व परिवल्गितम् ।
क्व गीतं मधुरध्वानं वनपाषाणखण्डकैः ॥ ६७ ॥
क्व पुंसा विहितैरर्कैः क्षपितं यामिनीतमः ।
क्व संकल्पमयैश्छाया क्रियते व्योमकाननैः ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
खून से लथपथ शरीरवाले मुर्दे कहाँ दौड, वन के
पत्थर के टुकड़ों ने कहाँ मधुर गीत गाया ? पुरुषों द्वारा पाषाण आदि से निर्मित सूर्यो ने कहाँ रात्रि का
अन्धकार दूर किया ? संकल्पमय आकाश वनों से कहाँ छाया की जाती है ?