Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 14, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 14, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
जितमेव मनो विद्धि वस्तुतो यन्न विद्यते ।
निकटात्सा चिरास्तैव या शिला नैव विद्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
वस्तुतः जो है ही
नहीं, उस मन को आप जीता हुआ ही जानिये । जो शिला है ही नहीं, वह अपने निकट से सुतरां दूर
निरस्त ही है