Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 22–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 17, verses 22–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 22-25
संस्कृत श्लोक
शून्यं तत्प्रकृतिर्माया ब्रह्मविज्ञानमित्यपि ।
शिवः पुरुष ईशानो नित्य आत्मैव कथ्यते ॥ २२ ॥
सदा सर्वं सदेवेदं नेह द्वित्वान्यते क्वचित् ।
विद्येते विद्यया व्याप्तं जगन्नेतरया धिया ॥ २३ ॥
आपातालमनन्तात्मा पूरितोऽम्भोधिरम्बुभिः ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं जगदापूर्णमात्मना ॥ २४ ॥
अतः सत्यमृतं नित्यं नानृतं विद्यते क्वचित् ।
वार्येव सकलाम्भोधिर्न तरङ्गादयः क्वचित् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
(चौथा निश्चय शून्यवादी के
मत में प्रविष्ट है, इस शंका का निवारण करते हुए कहते हैं ।) परिशिष्य, नित्य आत्मा ही वादियों द्वारा
शून्य, प्रकृति, माया, ब्रह्म, विज्ञान, शिव, पुरुष, ईशान-इन शब्दों से कहा जाता है। अवस्तु इन शब्दों
से नहीं कहा जाता है। यह सब सदा सत् ही है, यहाँ पर द्वित्व या अन्यत्व विद्यमान नहीं है। परमार्थ
स्वरूप दृष्टि से सारा जगत व्याप्त है, भ्रान्तिबुद्धि से व्याप्त नहीं है। जैसे असीम सागर पाताल तक
जल से भरा हुआ है वैसे ही ब्रह्मा से लेकर पेड-पौधों तक सारा जगत आत्मा से पूर्ण है, इसलिए प्रमाण
से बोधित ब्रह्मैक्य ही नित्य और सत्य है, उससे अतिरिक्त मिथ्या जगत कहीं नहीं है । जैसे कि सारा
सागर जल ही है, तरंग आदि कहीं पर नहीं है, यह सिद्ध हुआ