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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 37,38

संस्कृत श्लोक

त्वं चेद्बभूविथ पुरा तथेदानीं भविष्यसि । अद्य चेह स्थितोऽसीति ज्ञातवानसि निश्चयम् ॥ ३७ ॥ तदानन्तरगानन्यान्प्राणादीन्निकटस्थितान् । बन्धूनतीतान्सुबहून्कस्मात्त्वं नानुशोचसि ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आत्मा के असंगत्व, अद्वितीयत्व के दर्शन से शोक को असम्भव कहा है । अब भले ही आत्मा संगी हो, तथापि वह नित्य है या क्षणिक है या प्रागभाव या घटादि के समान कालान्तरे नष्ट होनेवाला है । इन सभी पक्षो में बन्धु के लिए शोक करना उचित नही है, यो प्रगल्भता से समाधान करने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी पहला पक्ष लेकर कहते हैं। आप यदि पूर्व जन्मों में हुए थे, भावी जन्मों मे होगे ओर इस समय इस जन्म में स्थित हैं, इस प्रकार के स्वभाववाले आत्मा को निश्चयरूप से जान चुके हैं, तो विद्यमान ओर निकट स्थित बन्धुओं के समान अतीत और बहुत-से प्राणों के समान प्यारे बन्धुओं का शोक क्यों नहीं करते हैं भाव यह कि विनिगमना विरह से सब में शोक न होने के कारण कहीं शोक करना उचित नहीं हे