Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 18, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 18, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
विविधजन्मशताहितसंभ्रमे जगति बन्धुरबन्धुरितीक्षणम् ।
भ्रमदशैव विवल्गति वस्तुतस्त्रिभुवनं चिरबन्धुरबन्ध्वपि ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँ विविध योनियों से विचित्र सैकड़ों जन्मों से यह भ्रम निहित है, ऐसे इस जगत में यह बन्धु है, यह
बन्धु नहीं है, यह भेददर्शन भ्रम के सिवाय ओर कुछ नहीं है, वस्तुतः तो जीवभावदृष्टि में तीनों भुवनं
के समस्त जीव अपने बन्धु ही हैं और ब्रह्मभावदृष्टि मे तो स्वयं ही सब कुछ हे, इसलिए त्रिभुवनस्थ सब
जीव ही अबन्धु भी हे