Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 2, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
मनोमात्रमिदं प्राप्यं तथैवेदं प्रयोजनम् ।
संपन्नं नो गिरिगुरु मौर्ख्याद्यक्षः शिशोरिव ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरा संकट भी कहते हैं।
इस अवश्य प्राप्तव्य आत्मतत्त्व में मन ही प्रमाण है और यह बाहरी विषय समुदाय ही जिसकी
सिद्धि में कारण और पुरुषार्थभूत है, ऐसा हमारा मन अपनी मूर्खतावश पहाड़ से भी बढ़-चढ़ कर भारी
बन गया है । जैसे कि बालक द्वारा मूर्खता से कल्पित यक्ष पहाड़ के समान भारी हो जाता है। भाव यह
है कि मन की सिद्धि विषयों के अधीन है अतएव विषयों से मन को निवृत्त करना संभव नहीं है, क्योकि
ऐसा करने से उसकी निःस्वरूपतापत्ति हो जायेगी। विषयों से उसकी निवृत्ति किये बिना तत्त्वसाक्षात्कार
में वह प्रमाण नहीं बनाया जा सकता, यह दूसरा संकट है