Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 20, Verses 22–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 20, verses 22–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 22-30

संस्कृत श्लोक

एतास्वन्यासु बह्वीषु जनयोनिषु पुत्रक । जातोऽसि जम्बूद्वीपेऽस्मिन्पुरा शतसहस्रशः ॥ २२ ॥ इत्थं तवात्मनश्चैव प्राक्तनं वासनाक्रमम् । पश्यामि सूक्ष्मया बुद्ध्या सम्यग्दर्शनशुद्धया ॥ २३ ॥ ममापि बह्व्यो बहुधा योनयो मोहमन्थराः । समतीताः स्मराम्यद्य ता ज्ञानोदितया दृशा ॥ २४ ॥ त्रिगर्तेषु शुको भूत्वा भेको भूत्वा सरित्तटे । वनेषु लावको भूत्वा जातोऽहमिह कानने ॥ २५ ॥ भुक्त्वा पुलिन्दतां विन्ध्ये कृत्वा वङ्गेषु वृक्षताम् । उष्ट्रत्वमपि विन्ध्याद्रौ जातोऽहमिह कानने ॥ २६ ॥ यश्चातको हिमगिरौ यो राजा पौण्ड्रमण्डले । व्याघ्रो यः सह्यकुञ्जेषु स एवाहं तवाग्रजः ॥ २७ ॥ यो गृध्रो दशवर्षाणि यो ग्राहो मासपञ्चकम् । यः समानां शतं सिंहः स एवेह तवाग्रजः ॥ २८ ॥ आन्ध्रग्रामचकोरेण तुषारनृपराजिना । श्रीशैलाचार्यपुत्रेण दम्भवत्कथ्यते मया ॥ २९ ॥ सर्वे विविधसंसारा विविधाचारचेष्टिताः । विलासा जन्मनो भ्रान्तेः स्मर्यन्ते प्राक्तना मया ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

हे वत्स, इन अन्यान्य बहुत सी जीवयोनियों में इसी जम्बू द्वीप में पहले सैकड़ों, हजारों बार तुम उत्पन्न हो चुके हो । मैं तत्वज्ञान से विशुद्ध सूक्ष्म बुद्धि से तुम्हारे और अपने पूर्व जन्मों के वासना क्रम को इस प्रकार देखता हूँ। भाई के जन्मों के कथन का उपसंहार कर अपने बहुत जन्मो का कहना आरम्म करते हैं। मेरी भी अज्ञान से जड़ बहुत-सी योनियाँ बहुत बार बीत चुकी हैं। आपको मैं ज्ञान से उत्पन्न दृष्टि से उनका स्मरण करता हूँ। त्रिगर्त देश में सुग्गा होकर, नदी के तट पर मेढक होकर, वनों मे लवा (एक प्रकार का छोटा पक्षी) होकर मैं इस वन में उत्पन्न हुआ हूँ। विन्ध्याचल में शवरयोनि का भोगकर, बंग देश में वृक्षयोनि का भोगकर, विन्ध्याचल में ही ऊँट की योनि का भी भोगकर इस वन में उत्पन्न हुआ हूँ। जो हिमालय मेँ चातक हुआ, जो पौण्ड्‌ देश में राजा हुआ और जो सह्याचल की झाड़ियों में व्याघ्र हुआ, वही मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। जो दस वर्ष तक गीध, जो पाँच महीने तक मगर और जो सौ वर्ष तक सिंह रहा, वही मैं इस जन्म में तुम्हारा अग्रज हुआ हूँ। आन्ध्र ग्राम में चकोर एवं तुषारप्रदेश में राजा के समान विराजमान होनेवाला, सामन्तरूप, श्री शैलाचार्य का पुत्र मैं अपुण्यात्मा होता हुआ भी लोगों की वंचना के लिए पुण्यनाम से प्रख्यापनरूप दम्भ से युक्त होकर यह कह रहा हूँ । अनेक जन्मों की भ्रान्ति के प्राक्तन सभी विलासों का मैं स्मरण करता हूँ, वे विविध संसारवाले और विविध आचारों से युक्त चेष्टावाले हैं