Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 26, Verses 10–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 26, verses 10–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 10-12
संस्कृत श्लोक
शुक्र उवाच ।
बहुनात्र किमुक्तेन खं गन्तुं यत्नवानहम् ।
सर्वदानवराजेन्द्र सारं संक्षेपतः शृणु ॥ १० ॥
चिदिहास्ति हि चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च ।
चित्त्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति संग्रहः ॥ ११ ॥
भव्योऽसि चेत्तदेतस्मात्सर्वमाप्नोषि निश्चयात् ।
नो चेत्तद्वह्वपि प्रोक्तं त्वयि भस्मनि हूयते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
शुक्राचार्यजी ने कहा : हे सर्वदानवराजेन्द्र, इस विषय में बहुत कहने से क्या लाभ है ?
मैं आकाश में जाने के लिए तत्पर हूँ, इसलिए संक्षेप से तुम सारभूततत््व को सुनो । इस जगत में
अन्यनिरपेक्ष सिद्धिवाला चैतन्य ही हे । चैतन्य के अधीन सिद्धिवाले इन भोगों के उत्कर्ष की विधि चित्
ही है, क्योकि "यतो वाचो निवर्तन्ते" इस श्रुति से पूर्ण चैतन्य ही सब आनन्दां के उत्कर्षं की अवधिरूप
से कहा गया हे । चित् में ही वेदवैचित्रय का अध्यास होने से यह सब चिन्मय ही हैं, क्योकि
"एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" ऐसी श्रुति है एवं "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्माऽस्मि",
"एष ब्रह्मैष इन्द्रः", “नाऽन्योऽतोऽस्तिद्रष्टा' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों से भोक्तृत्व भी चिन्मात्र ही है । इसी
प्रकार भोग्य समूहरूप ये लोक भी परमार्थतः चित् ही है, क्योंकि ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ऐसी
श्रुति है। यह सिद्धान्त का संक्षेप से संग्रह है। यदि तुम श्रद्धालु और विवेकी हो, तो इस निश्चय से तुम
सब कुछ प्राप्त कर सकोगे। यदि श्रद्धालु और विवेकी नहीं हो, ते तुमसे बहुत कहा गया भी राख में हवन
के तुल्य निष्फल है