Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 28, Verses 10–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 28, verses 10–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 10-13
संस्कृत श्लोक
चिन्तनानन्तरं दैत्या भार्गवं भास्वरं वपुः ।
ददृशुः कल्पितं प्राप्तं गन्धर्वनगरं यथा ॥ १० ॥
पूज्यमानोऽसुरगणैर्निविष्टो गुरुविष्टरे ।
ददर्श ध्यानमौनस्थं भार्गवो दानवेश्वरम् ॥ ११ ॥
विश्रम्य स क्षणमिव प्रेमवानवलोक्य च ।
बलिं विचारयन्दृष्ट्वा परिक्षीणभवभ्रमम् ॥ १२ ॥
देहरश्मिशतैर्दत्तदीप्तिभिः क्षीरसागरम् ।
क्षिपन्निव सभामाह हसन्वाक्यमिदं गुरुः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
चिन्तन के पश्चात दैत्यों ने कल्पित (०३) दैदीप्यमान भार्गव का शरीर प्राप्त हुए गन्धर्वनगर के समान
देखा । असुरो द्वारा पूजे जा रहे ओर गुरु के उच्च आसन पर स्थित शुक्राचार्यजी ने ध्यान से चुपचाप
बैठे हुए दानवराज बलि को देखा। दानवो पर प्रेम करनेवाले श्रीशुक्राचार्यजी ने क्षण भर विश्राम करके
ध्यान से देखकर विचार करते हुए बलि को संसारभरमरहित (जिसका संसार रूपी भ्रम क्षीण हो गया था)
जाना। तदनन्तर प्रकाशित करनेवाली अपने शरीर की सैकड़ों किरणों से क्षीरसागर को भी नीचा दिखा
रहे-से गुरु ने हँसते हुए सभा में स्थित लोगों से यह वाक्य कहा