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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 28, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 28, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

स्वयमेव हि कालेन प्रबोधमयमेष्यति । बीजकोशात्स्वसंवित्त्या सुप्तमूर्तिरिवांकुरः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

समय आने (२७) शुक्राचार्यजी के द्वारा ही, जो सप्तर्षियों की सभा में गये हुए थे, योगबल से बलि के महल में प्राप्त होने के कारण उस शरीर की कल्पना की गई थी, अतः उसे “कल्पित” कहा ।) पर यह स्वयं ही प्रबोध को ऐसे प्राप्त होगा, जैसे कि बीज के सम्पुट से “मैं अंकुर हूँ इस प्रबोध से सुप्त मूर्त अंकुर प्रबोध को प्राप्त होता है