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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 28, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 28, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

इत्युक्ता गुरुणा तत्र हर्षामर्षविषादजाम् । दैत्याश्चिन्तां जहुः शुष्कां मञ्जरीमिव पादपाः ॥ २० ॥ वैरोचनिसभासंस्थां विधाय प्राग्व्यवस्थया । स्वव्यापारपरास्तस्थुः सर्वं एवासुरास्ततः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

गुरु के ऐसा कहने पर जैसे वृक्ष सूखी हुई मंजरी का त्याग करते हैं वैसे ही वहाँ पर दैत्यों ने दर्प, कोप और दुःख से उत्पन्न हुई चिन्ता का त्याग किया । तदनन्तर पहले जैसी राज्य की व्यवस्था स्थापित कर रक्खी थी, उसीके अनुसार बलि के राज्यव्यवहार क्रम को स्थिर करके सब असुर अपने-अपने व्यापार में निरत हुए