Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 29, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 29, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
पूर्वमिष्टमनिष्टं त्वमनिष्टं चेष्टमित्यपि ।
परिकल्प्य तदभ्यासात्तत्ततोऽपि परित्यज ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप अशुद्ध चित्त ही है, तो उसकी सिद्धि के लिए क्रम से उपाय सुनिये ऐसा कहते है।
जो-जो वस्तु मन को प्रिय है वह अनर्थ साधन है और जो तप, क्लेश, इद्रिय संयम, प्राणायाम
आदि मन को अप्रिय हैं वे सब मेरे लिए आवश्यक हैं, ऐसी कल्पनाकर सप्तम भूमिका-का परिपाक होने
तक उसके अभ्यास से मन के ऊपर विजय प्राप्त होने पर उस कल्पना का भी तदनन्तर त्याग
कीजिये