Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 33, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
प्रह्लाद उवाच ।
त्रिभुवनभवनाभिरामकोशं सकलकलङ्कहरं परं प्रकाशम् ।
अशरणशरणं शरण्यमीशं हरिमजमच्युतमीश्वरं प्रपद्ये ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रह्लाद ने कहा : मे त्रिभुवन की सुरक्षित स्थिति के अनुकूल सुन्दर कोश गृहरूप, बाह्य ओर
आभ्यान्तर अन्धकार का विनाश करनेवाले, स्वयंज्योतिस्वरूप, अनाथं के रक्षक, शरण के योग्य,
सर्वशक्तिसम्पन्न, रजोगुण से ब्रह्मा, सत्त्वगुण से अच्युत ओर तमोगुण से शिवरूप, सब दुःखों का
हरण करनेवाले हरि के शरणागत होता हूँ