Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 33, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
सोऽपि संपूजितहरिः सुरौघो व्रजदम्बरम् ।
पुनर्मन्दरनिर्धूतात्कणजालमिवार्णवात् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पहले आकाश से समुद्र में
गिरा हुआ जलकणसमूह मन्दराचल से कम्पित सागर से फिर आकाश में चला जाता है वैसे ही पहले
आकाश से आये हुए वे देवता भी स्तुति द्वारा भगवान की पूजा कर फिर आकाश में चले गये