Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 33, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
प्रत्यहं पूजयामास देवदेवं जनार्दनम् ।
मनसा कर्मणा वाचा प्रह्लादो भक्तिमानिति ॥ ९ ॥
अथ पूजापरस्यास्य समवर्धन्त कालतः ।
विवेकानन्दवैराग्यविभवप्रमुखा गुणाः ॥ १० ॥
नाभ्यनन्ददसौ भोगपूगं शुष्कमिव द्रुमम् ।
न चारमत कान्तासु मृगो लोकमहीष्विव ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार के
भक्तिमान प्रह्लाद ने देवाधिदेव भगवान विष्णु की प्रतिदिन मन, कर्म ओर वचन से पूजा की | तदनन्तर
भगवत्पूजा में परायण प्रह्लाद के समय पाकर विवेक, आनन्द, वैराग्य, विभव आदि गुण बढ़ गये। जैसे
सूखे हुए वृक्ष की ओर किसी का आकर्षण नहीं होता है वैसे ही उसकी भोगों की ओर अभिरुचि न थी
ओर जैसे मृग जनाकीर्णं भूमि में प्रसन्न नहीं होता वैसे ही वह कान्ताओं मे नहीं रमता था। शास्त्रार्थ
कथन के सिवा अशास्त्रीय लोकवृत्तों में वह नहीं रमता था