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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

ममैतद्वपुरानीलं शङ्खचक्रगदाधरम् । सर्वसौभाग्यसीमान्तं ह्यस्मिञ्जगति वल्गति ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह प्रत्यक्ष ईश्वरभूत मैं सुन्दर सूर्यरूप होकर आकाश में विचरण करता हूँ एवं वायु रूप होकर अन्य वायु देह से भी आकाश में विचरण करता हूँ ॥४ २॥ मेरा शंख, चक्र ओर गदा धारण करनेवाला यह श्यामल शरीर, जो सब सौभाग्यो की चरम सीमा है, इस संसार में व्यवहार करता हे