Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
जगत्तावदिदं नाहं सवृक्षतृणपर्वतम् ।
यद्बाह्यमलमत्यन्तं तत्स्यां कथमहं किल ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
देह से बाह्मवस्तु तो आत्मा हो नहीं सकती, ऐसा कहते हैं ।
वृक्ष, तृण, पर्वत आदि से युक्त यह सारा जगत् तो आत्मा हो नहीं सकता, क्योकि जो बाहरी और
अत्यन्त जड है, वह मैं कैसे हो सकता हूँ