Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 15–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verses 15–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 15-19
संस्कृत श्लोक
योऽक्ष्णोः कनीनिकारश्मिजालप्रोतवपुः स्थितः ।
देव दर्शनरूपेण कथं सोऽत्र न दृश्यते ॥ १५ ॥
यस्त्वक्स्पर्शौ स्पृशन्सर्वं गन्धं तैलं तिले यथा ।
स्पर्शमन्तःकरोत्येष स कथं नानुभूयते ॥ १६ ॥
यः शब्दश्रवणादन्तः शब्दशक्तिं परामृशन् ।
रोमाञ्चं जनयत्यङ्गे स दूरस्थः कथं भवेत् ॥ १७ ॥
जिह्वापल्लवलग्नानि स्वदितस्याग्रतोऽपि च ।
स्वदन्ते यस्य वस्तूनि स्वदते स न कस्य च ॥ १८ ॥
पुष्पगन्धानुपादाय घ्राणहस्तेन देहकम् ।
य आलोकयति प्रीत्या कस्यासौ न करे स्थितः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे मैं देखा गया, ऐसा यदि कहो, तो चाश्चुष आदि सब वृत्तियों के प्रकाशन रूप से 'प्रतिबोधविदित्
मतम्“ (ब्रह्म प्रत्येक बोध में ज्ञात होता है) इस श्रुति में प्रदर्शित उपाय से मैंने तुम्हें देखा, ऐसा कहते हैं ।
हे देव, अन्तःकरण के चक्षु द्वारा घटादिदेश निर्गमन में घटावच्छिनन चैतन्यरूप जो नेत्र की पुतली
कि किरणों से ओतप्रोत शरीर होकर स्थित है, वह यहाँ पर दर्शन रूप से कैसे नहीं दिखाई देता है ? जो
त्वचा और उष्णत्व आदि स्पर्श को स्पर्शवृत्ति से व्याप्त करता हुआ जैसे तिल के अन्तर्गत तेल तिल से
मिले हुए पुष्पों की सुगन्ध ग्रहण करता है वैसे ही शीत आदि स्पर्श को व्याप्त करके प्रकाशित करता है,
वह कैसे अनुभूत नहीं होता ? जो शब्द सुनने से शब्दशक्ति को (गायन, काव्य आदि के गुण चमत्कार
को) प्रकाशित करता हुआ शरीर में रोमांच पैदा करता है, वह दूरवर्ती कैसे हो सकता है ? जिह्लारूपी
पल्लव में लगी हुई मीठी, खड़ी आदि वस्तुएँ स्वादरसिक प्रम के विषयभूत जिसे पहले ही स्वादित हो
जाती है, वह किसको सुखरूप से स्फुरित नहीं होता है ? हाथ के समान वस्तु के ग्रहण में कारणभूत
प्राणेन्द्रिय से गले में डाली हुई माला के फूलों की सुगन्ध ग्रहण कर जो माला से अलंकृत अपने शरीर को
प्रसन्नता से देखता है, वह किसको हाथ में स्थित की तरह स्पष्ट प्रत्यक्ष नहीं है ?