Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 31–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verses 31–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 31-34
संस्कृत श्लोक
चिरादहमहं जातः स्वात्मलाभश्चिरादयम् ।
चिरादुपशम याति कल्पस्यान्ते जगद्यथा ॥ ३१ ॥
चिरात्संसारगामित्वाद्दीर्घे संसारवर्त्मनि ।
विश्रान्तोऽस्मिचिरं श्रान्तः कल्पस्यान्त इवानलः ॥ ३२ ॥
सर्वातीताय सर्वाय तुभ्यं मह्यं नमो नमः ।
तेभ्योऽपि च नमस्तेस्तु ये मां त्वां प्रवदन्ति च ॥ ३३ ॥
अखिलानन्तसंभोगा न स्पृष्टा दोषवृत्तिभिः ।
जयत्यकृतसंरम्भा साक्षिता परमात्मनः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं चिरकाल से भे" हुआ हूँ, चिरकाल से मुझे मेरा स्वरूप लाभ हुआ हे ।
जैसे प्रलय के अन्त में प्रलयाग्नि में शान्ति होती है वैसे ही चिरकाल से भ्रम शान्ति को प्राप्त होता
है। चिरकाल से संसार में भ्रमणशील होने के कारण इतने काल तक दीर्घ संसार मार्ग मेँ थका हुआ
मैं इस समय जैसे प्रलय के अन्त में प्रलयाग्नि श्रान्त होकर विश्राम को प्राप्त होती है वैसे ही विश्राम
को प्राप्त हुआ हूँ । सबसे परे सर्वरूप त्वत्स्वरूप मुझको नमस्कार है । जो गुरु अथवा वेदान्त तुमको
मद्रूप कहते हैं, उनको भी नमस्कार है । जिससे अनन्त भोग प्रकाश्य हैं, फिर भी जो प्रकाश्यो की
दोष वृत्तियों से स्पृष्ट नहीं है और जिसमें अभिनिवेश नहीं है (जो उदासीन है) ऐसी परमात्मा की
साक्षिता सर्वोत्कृष्टरूप से विद्यमान है