Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 39, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
शुद्धपक्षस्य शुद्धस्य हंसौघः सरसो यथा ।
यस्माद्गुणौघो निर्याति जीवितं तस्य शोभते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
तालाब से हंसों के समूह के समान जिससे गुणों का (शान्ति, क्षमा, माधुर्य आदि का) समूह चला
जाता है, जिसके तत्त्वज्ञानी ही आत्मीय है और स्वयं शुद्ध है, उसका जीवन शोभित होता है