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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 29–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 4, verses 29–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 29-32

संस्कृत श्लोक

हितानुबन्धि हृद्यं च पुण्यमानन्दसाधनम् । शिरसा ध्रियते कैर्नो सिद्धैस्त्वदनुशासनम् ॥ २९ ॥ प्रतिक्षिपन्तः संसारमिहिकावरणं वयम् । प्रसन्नास्त्वत्प्रसादेन वर्षान्त इव वासराः ॥ ३० ॥ आपातमधुरारम्भं मध्ये सौभाग्यवर्धनम् । अनुत्तमफलोदर्कं पुण्यं त्वदनुशासनम् ॥ ३१ ॥ विकासिसितमम्लानमाह्लादितशुभाशुभम् । त्वद्वचःकुसुमं नित्यं श्रीमत्फलदमस्तु नः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

सब अनिष्टं की निवृत्ति करनेवाला, अत्यन्त मधुर, परमपुरुषार्थ का साधन ओर अनुल्लंघनीय होने के कारण आपका वचन अवश्य सिर से प्रणाम कर हृदय में धारण करने योग्य है, ऐसा कहते हैँ । भगवन्‌, आपका शासन हितकारी, मनोहर, पुण्य ओर आनन्द का साधन है, अतएव किन देवयोनि विशेष सिद्धो द्वारा अथवा स्वतःसिद्ध सनकादि द्वारा या योग, मन्त्र आदि से सिद्ध पुरुषों द्वारा सिर से धारण नहीं किया जाता ? संसाररूपी कुहरे के आवरण का निवारण कर रहे हम लोग आपके प्रसाद से वर्षा ऋतु के अन्त में दिवसों के समान प्रसन्न हो गये हैं यानी हम में आपका उपदेश व्यर्थ नहीं हुआ। आपका पवित्र उपदेश तीनों कालों में हितकारी है । श्रवण के समय वह मधुर है, मनन ओर निदिध्यासन के समय अन्तर्मुखता से होनेवाले शम आदि के सम्पत्ति सुख को बढ़ानेवाला है एवं उसका उत्तरकाल मोक्षरूप उत्तम फल से युक्त ह । विकसित, सफेद, अम्लान एवं पुण्य, पाप ओर उनके फलों को एकमात्र आनन्द रूप बना देनेवाला आपका उपदेश रूपी कल्पवृक्ष पुष्प हम लोगों को कल्याणकारी फल देनेवाला हो