Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 4, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
सकलशास्त्रविचारविशारद प्रसृतपुण्यजलैकमहाह्रद ।
भज भृशं विततव्रत संप्रति प्रसृततां हतकिल्बिष संततिम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब तीर्थूप होने के कारण महानदरूप से गुरु का सम्बोधन कर अवशिष्ट उपदेश कहने के लिए
प्रार्थना करते हैं।
हे देशकाल और शास्त्र के विचारों में विशारद, हे फैले हुए सदाचाररूपी पवित्र जलों के एकमात्र
जलाशय, हे महाव्रत, हे निष्पाप मुनिजी, इस समय आप मेरे प्रति उपदेश वाणी के प्रवाह का पुन: प्रसार
कीजिये। जलाशयपक्ष में सब शास्त्ररूपी हंस आदि पक्षियों के संचार से सुशोभित, मुनियों द्वारा जिसमें
अपने व्रत विस्तृतरूप से किये गये हैं, स्नान करनेवालों के पापों का विनाश करनेवाले, फैले हुए पवित्र जल
के एकमात्र आश्रय हे जलाशय तुम इस समय वाणी प्रवाहरूपी अपने प्रवाह का विस्तार करो