Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इदमुत्तमसिद्धान्तसुन्दरं सुन्दराकृते ।
उपशान्तिप्रकरणं श्रृणुष्वावहितो हितम् ॥ १ ॥
दीर्घसंसारमायेयं राम राजसतामसैः ।
धार्यते जन्तुभिर्नित्यं सुस्तम्भैरिव मण्डपः ॥ २ ॥
सत्त्वस्यजातिभिर्धीरैस्त्वादृशैर्गुणबृंहितैः ।
हेलया त्यज्यते पक्वा मायेयं त्वगिवोरगैः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे मनोहर आकृतिवाले श्रीरामचन्द्रजी , उत्तम सिद्धान्तं से सुन्दर, मोक्षरूपी
कल्याण देनेवाले इस उपशम प्रकरण को आप सावधान होकर सुनिये ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सन्तर (उचित अन्तर पर स्थित) खम्भे गृहमण्डप को धारण करते हैं वैसे
ही राजस-तामस जीव इस विशाल संसारमाया को धारण करते हैं। जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली का
त्याग करते है वैसे ही पूर्वोक्त लक्षणवाले, राजससात्त्विक और शुद्ध सात्विक आपके तुल्य गुणवान धीर
पुरुष अवहेलना द्वारा इस तुच्छ माया का त्याग करते हैं
सर्ग सन्दर्भ
चौथा सर्ग समाप्त पाँचवाँ सर्ग अविवेक से बढ़ी हुई मनोमात्ररूपी जगत-सृष्टि की निवृत्ति के उपाय का क्रम ।