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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 44, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 44, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

ब्राह्मण उवाच । असंख्येयजगद्भूतहृत्पद्मकुहरालिने । जगत्त्रयेकनलिनीसरसे विष्णवे नमः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण ने कहा : भगवान्‌, असंख्य ब्रह्माण्डों में विद्यमान प्राणियों के हृदयकमल मध्य में स्थित भ्रमररूप और त्रिजगत्‌ रूपी कमलिनी के तालाबरूप भगवान्‌ विष्णु को नमस्कार है