Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 45, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ततो भूतग्रहग्रामजन्मदेशमुपेत्य तम् ।
संस्थितं मठिकां पर्णैः कृत्वा दूरे मुनीन्द्रवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त भूतमण्डल नामक देश की अपनी जन्मभूमि में जाकर
दूर पर्णं कुटी बनाकर मुनीश्वर के समान रहने लगा