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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 46, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

वातोद्धूतचितावह्निप्रज्वलद्व्योममण्डलम् । उड्डीनाग्निकणव्राततारासारदिगन्तरम् ॥ ३७ ॥ प्रमत्ततस्करक्रन्दद्वेल्लद्वालकुमारकम् । संत्रस्तनागरापास्तजीविताख्यमसंस्थिति ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

चिताओं में जले हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के मांस से अधिक गन्धवाली उत्पात की आँधी द्वारा मिट्टी के ढेरों से उठे हए धूलि कणों से ऐसा प्रतीत होता था मानों उस पर तुषार की वृष्टि हुई हो ॥ ३ ५॥ वायु से दूर-दुर तक फैली चर्बी की गन्ध से दूर से लाये गये पक्षियों और पिशाच आदि के मण्डलों से छिन्न सूर्यवाला वह नगर बादलों से जिसमें सूर्य आच्छन्न हो ऐसे आकाश की नाई हुआ ॥ ३ ६॥ वायु से उड़ाई गई चिताओं की अग्नि से उस नगर का आकाश मण्डल जल रहा था तथा उड़े हुए अग्नि कणों के संघातरूपी तारों से दिशाएँ कर्बुरित हो गई थी