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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verses 65–66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verses 65–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 65,66

संस्कृत श्लोक

गच्छता भवता भूतदेशं पान्थेन कन्दरे । कस्मिंश्चिद्विप्र विश्रान्तं कुरङ्गेणेव कानने ॥ ६५ ॥ तत्रैव श्रममूढत्वादिदं तद्भूतमण्डलम् । इदं तच्छ्वपचागारमिति दृष्टं न सत्यतः ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

तुम भूतदेश और कीर देश को अभी भी नहीं गये, किन्तु अतिथि का वाक्य सुनकर भूतदेश को जाते हुए तुमने रास्ते में थकावट के कारण किसी पर्वत की गुफा में विश्राम किया और वहीं श्रम से विमूढ़ चित्त होने के कारण स्वप्न की तरह यह वह भूतमण्डल है, यह चाण्डाल का घर हैं इत्यादि सब तुमने भ्रमात्मक देखा है, परमार्थतः नहीं देखा है