Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
समास्वादयतस्तत्त्वं स्वसंवेदनधर्मिणः ।
विषं हालाहलमपि यास्यत्यमृततामथ ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मज्ञान
सम्पन्न एवं तत्त्व का आस्वाद ले रहे पुरुष के लिए हलाहल विष भी अमृत बन जाता हे । भाव यह है कि
सबके अमृत होने पर विष की भी अमृतता अर्थात् (सहज) सिद्ध हो गई