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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 51, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

सुस्निग्धशीतलच्छायां प्रकटां रत्नदीपकैः । सुगुप्तां वनदेवीनामन्तःपुरकुटीमिव ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके दरवाजे पर बडी मीठी ओर दण्डी छाया थी, रत्नरूपी दीपको से वह जगमगाती थी ओर वनदेवियों के अन्तःपुर की कुटी के समान बड़ी गुप्त थी