Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
आगत्य श्रोत्रतां मूर्ख व्यर्थोत्थानोपबृंहिताम् ।
धिया शब्दानुसारिण्या मृगवन्मा क्षयं व्रज ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
शब्द आदि विषय दुःख के लिए ही है ऐसा जो पूर्व में कहा है, उनमें से प्रत्येक का दृष्टान्तो के
उदाहरणो द्वारा विस्तार करते हैँ ।
२ "पद्मकूटीमिव" इससे वहाँ पर प्रविष्ट हुए उनको निरतिशय आनन्द रस-पान से विश्रान्ति
मिलेगी, यह अभिव्यक्त होता है ।
५ पद्मासन का ग्रहण सिद्धासन का उपलक्षण है, क्योंकि एड़ियों से वृषणो को दवाना उसी
में घट सकता है ।
हे मूर्ख, व्यर्थ बहिर्मुखतारूप उत्थान से बढ़ी हुई श्रोत्रेन्द्रिय तादात्म्यापत्तिरूप श्रोत्रता को प्राप्त
कर (“प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक् पश्यंश्चक्षुः श्रृण्वन् श्रोत्रम्” इत्यादि से श्रवण आदि के
समय आत्मा के श्रोत्रादि भाव का श्रवण हे ।) व्याध के गीत और घंटा की ध्वनि से मोहित मृग के समान
शब्दनुसारिणीवृत्ति से नाश को प्राप्त मत होओ