Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
त्वक्तामागत्य दुःखाय स्पर्शोन्मुखतया धिया ।
मूर्ख मा बद्धतामेहि गजीलुब्धगजेन्द्रवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मूर्ख मन, उस स्पर्शोन्मुखता से (स्परशर्हि
सुखानुभव की इच्छा से) केवल दुःख के लिए त्वगइन्द्रियता को प्राप्त होकर तू हाथिनी पर लोलुप हाथी
के समान बंधन को मत प्राप्त हो पीलवान लोग सिखाई हुई हथिनी से बन गज को लुभाकर गर्त की
ओर लाकर गर्त में गिराने आदि से बोधिते हैं, यह प्रसिद्ध है