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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

आगच्छतो यथाकामं प्रतिभासान्पुनः पुनः । अच्छिनन्मनसा शूरः खङ्गेनेव रणे रिपून् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार शूरवीर पुरुष सामने आये हुए शत्रुओं को रण में तलवार से काट डालता है उसी प्रकार आत्मज्ञानी उद्दालक ने अपनी इच्छानुसार बार-बार आ रहे विपरीत भावनाजन्य (मिथ्यावासना से उत्पन्न) विकल्पों को दृढ़ मन के द्वारा नष्ट कर दिया