Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यदा संक्षीयते चित्तमभावात्यन्तभावनात् ।
चित्सामान्यस्वरूपस्य सत्तासामान्यता तदा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब चित् पूर्ण शुद्ध है, उसमें कुछ नहीं है, ऐसी भावना से
यानी तीनों कालों में भी दृश्य वस्तुतः नहीं है यों श्रुति, युक्ति ओर अनुभव से निरन्तर अनुसन्धान
करने से चैत्य संस्कारों का मूलोच्छेद होने पर चित्त भली भाँति क्षीण हो जाता है तब जड ओर चेतन
सबमें अनुगत स्वतःसिद्ध सत्तामात्र ही सत्तासामान्य होता है । छठी भूमिका में चित्त के अवान्तर भेदों
का परिमार्जन कर चित् सामान्यभूत चैत्याभाव की अत्यन्त भावना करने से चैत्यसंस्कारों का आत्यन्तिक
उच्छेद होने पर जब चित्त क्षीण हो जाता है तब स्वमात्रसत्तासे स्वतःसिद्ध हो रही परिशिष्ट चित्-
अचित् दोनों में अनुगत सत्ता ही सत्तासामान्य होती है, अर्थात् विक्षेप के हेतुभूत चित्त का अभाव होने
से आत्मा की स्वरूपसत्ता ही अवशिष्ट रहती है, यह भाव है