Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
नूनं चेत्यांशरहिता चिद्यदात्मनि लीयते ।
असद्रूपवदत्यच्छा सत्तासामान्यता तदा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त वृत्तियों में प्रतिबिम्बित चैतन्य
जब सकल प्रपच का बाध होने पर अन्तःकरण की वृत्तियों ओर वृत्ति के विषयों से रहित होकर स्वात्मा
में अर्थात् बिम्ब चैतन्य में लीन होता है तब उस बिम्ब की असत् रूप की नाई (जिसमें रूप नहीं हैं यानी
आकाश की नाई) स्वच्छ सत्तासामान्यता समझना चाहिये