Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यदा सर्वमिदं किंचित्सबाह्याभ्यन्तरात्मकम् ।
अपलप्य वसेच्चेतः सत्तासामान्यता तदा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त की वृत्तियो मे अभिव्यक्त हुआ
अखण्ड चैतन्य जब बाह्य एवं आभ्यन्तर का जो कुछ है इन सबका अपलाप कर (यह कुछ नहीं हे, ऐसा
निश्चय कर) स्थित होता है तब सत्तासामान्यता समझनी चाहिये